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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सेना के जेएजी पदों पर लैंगिक आरक्षण खत्म, अब होगी संयुक्त मेरिट से भर्ती

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नई दिल्ली,

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारतीय सेना के जज एडवोकेट जनरल (जेएजी) पदों पर पुरुषों के लिए आरक्षण और महिलाओं के लिए सीमित सीटें तय करने की नीति को असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यह नीति “मनमानी” है और संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है।

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न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की खंडपीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि अब से भर्ती पूरी तरह लैंगिक तटस्थ हो और सभी उम्मीदवारों (पुरुष व महिला) के लिए एक संयुक्त योग्यता सूची तैयार की जाए, जिसमें प्रत्येक उम्मीदवार के अंक भी सार्वजनिक किए जाएं।

अदालत की टिप्पणी
पीठ ने कहा, “कार्यपालिका पुरुषों के लिए सीटें आरक्षित नहीं कर सकती। छह सीट पुरुषों और तीन सीट महिलाओं के लिए तय करना भर्ती के नाम पर आरक्षण देने जैसा है। यह संविधान में निहित समानता की अवधारणा के विरुद्ध है। जेएजी शाखा की प्राथमिक भूमिका कानूनी सलाह देना है, इसलिए चयन में केवल योग्यता मायने रखेगी। यदि सभी महिला उम्मीदवार मेधावी हैं, तो सभी का चयन होना चाहिए और यही नियम पुरुषों पर भी लागू होगा।”

मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला दो महिला याचिकाकर्ताओं से जुड़ा है, जिन्होंने 2023 की जेएजी भर्ती अधिसूचना में छह पद पुरुषों और तीन पद महिलाओं के लिए तय करने के प्रावधान को चुनौती दी थी। दोनों ने क्रमशः चौथा और पांचवां स्थान हासिल किया था, लेकिन कम महिला सीटों के कारण चयनित नहीं हो सकीं।

अगस्त 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने दो पद खाली रखने के निर्देश दिए थे और मई 2025 में सुनवाई पूरी होने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा। अदालत ने पहली याचिकाकर्ता अर्शनूर कौर को तुरंत जेएजी अधिकारी के रूप में अगले प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में शामिल करने का आदेश दिया, जबकि दूसरी याचिकाकर्ता के बारे में कहा कि वह अब भारतीय नौसेना में कार्यरत हैं और यदि चाहें तो वहीं कार्य जारी रख सकती हैं।

अंकों के आधार पर भेदभाव का मामला
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता नंबर 1 ने 447 अंक प्राप्त किए, जो पुरुष उम्मीदवार प्रतिवादी नंबर 3 के 433 अंकों से अधिक थे, लेकिन फिर भी उसे चयनित नहीं किया गया। प्रतिवादी नंबर 3 पुरुष मेरिट सूची में तीसरे स्थान पर थे, जबकि महिला मेरिट सूची में दसवें स्थान पर रही उम्मीदवार के अंक भी उनसे अधिक थे। अदालत ने इसे “अप्रत्यक्ष भेदभाव” माना और स्पष्ट किया कि यह फैसला सेना में किसी पूर्वाग्रह को थोपने के लिए नहीं बल्कि संविधान को लागू करने के लिए है।

सरकार के तर्क पर सवाल
केंद्र सरकार ने कहा कि जेएजी पद लैंगिक रूप से तटस्थ हैं और 2023 से चयन अनुपात 50:50 कर दिया गया है। इस पर अदालत ने सवाल उठाया – “जब पद तटस्थ हैं तो महिलाओं के लिए कम सीटें क्यों तय की गईं?” जस्टिस मनमोहन ने कहा कि यदि 10 महिलाएं जेएजी के लिए अर्हता प्राप्त करती हैं और वे पुरुष उम्मीदवारों से बेहतर हैं, तो सभी को चयनित होना चाहिए। अदालत ने केंद्र के इस तर्क को भी खारिज किया कि महिला जेएजी अधिकारियों को अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं पर लड़ाकू के रूप में भेजने पर उन्हें युद्धबंदी बनाए जाने का खतरा होगा।

फैसले का महत्व
यह फैसला सेना में भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह योग्यता आधारित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अब जेएजी में भर्ती करते समय लिंग आधारित सीटों का बंटवारा नहीं होगा और चयन केवल मेरिट के आधार पर किया जाएगा। साथ ही, सभी उम्मीदवारों की संयुक्त योग्यता सूची और प्राप्तांक सार्वजनिक किए जाएंगे।

 

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